Saturday, April 6, 2024

Gayatri valmiki

 श्लोकेन प्रति साहसिकं प्रथमे क्रमात् |

गायत्री अक्षरम् एकैकम् स्थापयामास वै मुनिः ||

1. त -
तपः स्वाध्याय निरतम तपस्वी वाग्विदम् वरम् |
नारदम् परि पप्रच्छ वाल्मिकिर् मुनि पुंगवम् || 1-1-
2. स -
स हत्वा राक्षसान् सर्वान् यज्ञ घनान रघुनन्दाः |
ऋषिभिः पूजितः तत्र यथा इन्द्रो विजये पुरा || 1-30-243
. वि -
विश्वामित्रः स रामस्तु श्रुत्वा जन भाषितम् |
वत्स राम धनुः पश्य इति राघवम् अब्रवित् || 1-67-12 - बालकाण्डम्
4. तु -
तुष्टाव अस्य तदा वंशम् प्रविष्य स विशम् प्रश्नः |
शयनेयम् नरेन्द्रस्य तत् आसाद्य व्यतिष्ठत || 2-15-195
. व -
वनवासं हि संख्याय वासांसि आभरणानि च |
भर्तारम् अनुगच्छन्त्यै सीतायै शशुरो ददौ || 2-40-14
6. रा -
राजा सत्यम् च धर्मः च राजा कुलवतम् कुलम् |
राजा माता पित चैव राजा हितकरो नृणाम् || 2-67-347
. नि -
निरिक्ष्य स कृष्णम् तु दर्शन भरतो गुरुम् |
उत्जे रामम् आसीनम् जटा मंडल धारिणम् || 2-99-25 - अयोध्याकाण्डम्
8. य -
यदि बुद्धिः कृता दृष्टुम् अगस्त्यम् तम महामुनिम् |
अद्य एव गमने रोचयस्व महयशः || 3-11-494
. भ -
भरतस्य आर्य पुत्रस्य श्वश्रुणाम् मम च प्रभो |
मृग रूपम् इदम् व्यक्तिम् विस्मयम् जनयिष्यति || 3-43-1810
. ग -
गच्छ शीघ्रम् इतो राम सुग्रीवम् तम महाबलम् |
वैश्यम् तम कुरु क्षिप्रम् इतो गत्वा अद्य राघव || 3-72-17 - अरण्यकाण्डम्
11. दे -
देश कालौ प्रतिक्षस्व क्षम्मानः प्रिय प्रियो |
सुख दुःख सहः काले सुग्रीव वशगो भव || 4-22-20
12. व -
वन्द्याः ते तु तपः सिद्ध सप्तसा वीत् कल्माशाः |
प्रष्टव्याः ते अपिसितायाः क्रीड़ाम् विनय अन्वितैः || 4-43-33 - किष्किन्धाकाण्डम्
13. स -
स निर्जित्य पुरीम् श्रेष्ठम् लंकाम् तम काम रूपिणीम् |
विक्रमेण महतेजा हनुमान् मारुत आत्मज || 5-4-1
14. ध -
धन्या देवाः स गंधर्व सिद्धाः च परम ऋषयः |
मम पश्यन्ति ये नाथम् रामम् राजीव लोचनम् || 5-26-41
15. म -
मंगलाभिमुखी तस्य सा तदा आसीत् महाकपेः |
उपतस्थे विशालाक्षी प्रयता हव्यवाहनम् || 5-53-28 - सुन्दरकाण्डम्
16. हि -
हितम् महार्थम् मृदु कय संहितम्
उद्गम कलायति संप्रति क्षमाम् |
निसंय तद् वाक्यम् उपस्थित ज्वरः
प्रसंगवान् उत्तरम् एतत् अब्रवीत् || 6-10-27
17. ध -
धर्मात्मा राक्षसम् श्रेष्ठः संप्राप्तो अयम विभीषणः |
लंकेश्वर्यम् ध्रुवम् श्रीमन् अयम् प्राप्नोति एकान्तकम् || 6-41-678
. यो -
यो वज्र पाता अश्नि सन्निपातन्
न चुक्षुभे वा अपि चचाल राजा |
स राम बाण अभिहतो भृष अर्थः
चचल चापम् च मुमोच वीरः || 6-59-141
19. य -
यस्य विक्रमम् आसाद्य राक्षस मृत्युम् गताः |
तम मन्ये राघवम् वीरम् नारायणम् अनामयम् || 6-72-11
20. न -
न ते ददृशिरे रामम् दहन्तम् अरि कोरम् |
मोहिताः परम अस्त्रेण गंधर्वेण महात्मना || 6-93-2621
. प्र -
प्रणय देवताभ्यः च ब्राह्मणेभ्यः च मैथिली |
बद्ध अंजलि पुता च इदम् उवाच अग्नि निकटः || 6-116-24 - युद्धकाण्डम्
22. च -
किरणत् पर्वत इन्द्रस्य गण देवाः च कंपिताः |
चंचल पार्वती च अपि तदा अशलिष्ट महेश्वरम् || 7-16-26
30. द -
दाराः पुत्र पुरम राष्ट्रम् भोग आच्छादन भजनम् |
सर्वम् एव अविभक्तम् नो भविष्यति हरि ईश्वरः || 7-34-41
24. य -
यम एव रात्रिम् शत्रुघ्नः पर्ण शालाम् समाविषत् |
तम एव रात्रिम् सीता अपि प्रसूता दाकर द्वयम् || 7-66-1 - उत्तरकाण्डम्

इदम् रामायणम् कृत्स्नम् गाय बीज संयुतम |
सं त्रिध्यम् यः पथेत् नित्यम् सर्व पापैः प्रमुच्यते ||

यावत् आवर्तते चक्रम् यावती च वन्दशुद्धा |
तावत् वर्ष सहस्राणी स्वामित्वम् अवधराय ||
मंगलम् कोसलेन्द्राय महनीय गुणात्मने |
चक्रवर्ति तनुजाय सर्वभौमय मंगलम् ||

इतिगाय रामायणम् सम्पूर्णम्

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इति वाल्मिकी रामायणे आदिकाव्ये बाल काण्डे प्रथमः सर्गः ||

इस प्रकार, यह भारत के प्रथम महाकाव्य वाल्मिकी रामायण के बाला काण्ड का पहला अध्याय है।

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